भोथली राशन दुकान में ‘चावल का खेल’: मिडिया के सामने डगमगाए संचालक के बोल, पूछा सवाल तो बोले- ‘आया भी है और नहीं भी’!

सारंगढ़-बिलाईगढ़ |शासन की जनहितैषी योजनाओं को जमीनी स्तर पर कैसे पलीता लगाया जाता है, इसकी जीती-जागती मिसाल सारंगढ़ तहसील के ग्राम पंचायत भोथली में देखने को मिली है। यहाँ शासकीय उचित मूल्य की दुकान के संचालक ने न केवल गरीबों के राशन पर ‘कटौती’ की, बल्कि मीडिया के सवालों पर ऐसे बेतुके जवाब दिए कि पूरा सिस्टम ही सवालों के घेरे में आ गया है।
जहाँ एक ओर सरकार भीषण गर्मी और आगामी दिनों को देखते हुए हितग्राहियों को राहत पहुँचाने के उद्देश्य से तीन माह का राशन एकमुश्त देने का दावा कर रही है, वहीं भोथली के राशन दुकान संचालक ने अपनी मनमानी की सारी हदें पार कर दी हैं।
तीन महीने का चावल ‘गायब’, हितग्राही परेशान
शासन का स्पष्ट आदेश है कि अप्रैल, मई और जून का राशन एक साथ वितरित किया जाए। गोदामों से पर्याप्त मात्रा में चावल भेजा जा चुका है। लेकिन भोथली के संचालक ने अपनी ‘विशेष नीति’ के तहत ग्रामीणों को सिर्फ दो महीने का राशन थमाया। सवाल उठता है कि जब स्टॉक पूरा आया है, तो वितरण अधूरा क्यों?
जब गोदाम से तीन महीने का राशन निकला है, तो वह एक महीने का चावल आखिर गया कहाँ? क्या यह किसी बड़े सिंडिकेट का हिस्सा है या संचालक की व्यक्तिगत दादागिरी?
ग्रामीणों के हक पर ‘सिस्टम’ का डाका
भोथली के भोले-भाले ग्रामीण आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि संचालक ने उन्हें गुमराह करते हुए राशन कम दिया, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में तीन माह का वितरण दर्शाने की तैयारी है। तपती धूप में अपना हक लेने पहुँचे मजदूरों और बुजुर्गों के निवाले को छीनने का यह कृत्य क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
मीडिया के सामने खुली पोल: “आया भी है और नहीं भी…
जब मीडिया की टीम ने मौके पर पहुँचकर इस गड़बड़ी पर संचालक से सीधा सवाल किया, तो वे बगलें झाँकने लगे। उनके जवाब किसी हास्य कविता से कम नहीं थे:
सवाल:- क्या आपके पास तीन माह का राशन आ गया है?
जवाब:-“आया भी है और नहीं भी आया है, आधा आया है और आधा नहीं।”
कटाक्ष….. यह कैसी गणित है जो केवल भोथली के संचालक को समझ आ रही है? या तो राशन आता है या नहीं आता, ‘आधा-आधा’ का यह मायाजाल सिर्फ भ्रष्टाचार को छुपाने का एक भद्दा बहाना नजर आता है।
सारंगढ़ जाऊंगा… जिम्मेदारी से भागने का नया पैंतरा
जब संचालक से पूछा गया कि बचा हुआ राशन कब मिलेगा, तो उन्होंने गोल-मोल जवाब देते हुए कहा कि जो बचा है उसे दे दूँगा और इसके लिए सारंगढ़ (मुख्यालय नान ) जाऊँगा। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल समय काटने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने की साजिश है।
प्रमुख सवाल जो प्रशासन से जवाब मांगते हैं:
1. ऑनलाइन रिकॉर्ड बनाम हकीकत – सरकारी पोर्टल पर अगर तीन माह का स्टॉक दिख रहा है, तो संचालक ‘आधा राशन’ आने का झूठ कैसे बोल सकता है?
2. गरीबों का शोषण – क्या प्रशासन को दिखता नहीं कि चिलचिलाती धूप में राशन दुकान के चक्कर काटते ग्रामीणों का हक मारा जा रहा है?
3. जांच की सुस्ती – क्या खाद्य विभाग ऐसे ‘गोल-मोल’ जवाब देने वाले संचालकों को संरक्षण दे रहा है?
भोथली का यह मामला सिर्फ एक दुकान की अनियमितता नहीं, बल्कि गरीबों के राशन पर डाका डालने की बड़ी कोशिश है। ग्रामीणों ने मिडिया के माध्यम से कलेक्टर साहब से इस ‘भ्रामक’ जवाब देने वाले संचालक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
अब देखना होगा कि साहब ‘सारंगढ़’ से चावल लाते हैं या सिर्फ बहाने!




