सारंगढ

पत्रकारिता जगत को बदनाम करने में तुले कुछ लोग….? कलम के सच्चे सिपाहियों का नाम हो रहा खराब…! सरपँच, अधिकारी, कर्मचारी, नेता और व्यापारी त्रस्त…! सच्चे कलमकारों पर लग रहे साजिश और झूठे आरोप…..

रायगढ़। पत्रकार, एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही आंखों के सामने एक ऐसे शख्स की छवि बचपन मे बनती थी मानो कोई कलम का पुजारी हो, जिसको न तो सत्ता का खौफ़ हो,झूठे मुकदमो का, न समाज के बाहुबलियों के निरकुंश दमनात्मक नीतियों का। एक प्रखर वक्ता, लेखक,मुखमंडल में चमक लिए मानो कोई सिपाही हो जो किसी गरीब,कमजोर की आवाज़ बनकर असत्य से टकरा जाए.. पर जैसे जैसे वक्त बढ़ते गया राजनीति पत्रकारिता में हावी होते गयी पत्रकारों की छवि भी धूमिल होते गयी। “कुछ पत्रकार पत्रकार न होकर पक्षकार बन अपनी तिजोरी भरते गये”.. बिन पगार पूरी तरह जनता के हित मे तैयार रहने वाले कलम के पुजारी अपने नैतिक मूल्य को दरकिनार करते किसी न किसी के पक्षकार बनके जनता को वही खबर परोसने लगे जो उन्होंने अपने हिसाब से बनाये थे। आज तो आपको हर चौथी गाड़ी में press या media लिखा दिख जायेगा।

पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है इस मुद्दे पर आज देश में गर्मा-गर्म बहस भी छिड़ चुकी है। देश के लोकतंत्र का मजबूत चौथा स्तम्भ(शेर) कहा जाने वाला पत्रकारिता का क्षेत्र भी अब इस भ्रष्टाचार से अछूता नही रहा। आज पैसे की चमक ने पत्रकारिता के मिशन को व्यवसाय बना दिया।

आज पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन बढ़ती तादाद में अशिक्षित,कम पढ़े लिखे और अप्रशिक्षित संवाददाताओं की एक बड़ी दिशाहीन सेना का प्रवेश भी पत्रकारिता के क्षेत्र में भ्रष्टाचार बढ़ाने में बड़ा योगदान दे रहा है। ये वो लोग है जो जेब में कलम लगाकर रोज सुबह शाम सरपँच, जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों और दफ्तरों के चक्कर काटते रहते है।

बड़े स्तर पर तथाकथित रूप से प्रेस से जुड़कर कुछ पूँजीपतियों ने अपने नापाक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये देश के सब से शक्तिशाली संसाधन मीडिया को गुपचुप तरीके से कारपोरेट मीडिया का दर्जा दिला दिया। कारपोरेट मीडिया से मेरा मतलब है मीडिया प्रोड़क्शन, मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन,मीडिया प्रोपट्री इत्यादि से। लेकिन ये बड़े स्तर के मुद्दे हैं, हमे सरोकार है छत्तीसगढ़, रायगढ़, सारंगढ़ या अपने आसपास की समस्या से, जिसमे सारंगढ़ तो मानो पत्रकारों का गढ़ बन गया है अब ये पत्रकार सच्चे हैं या झूठे ये वक्त ही बताएगा।

बैग पकड़ बाईक उठा चल पड़े रोजी रोटी की तलाश में-

सारंगढ़ में कुछ पत्रकारों की सेना ऐसी है जिन्हें पत्रकारिता सबसे आसान व्यवसाय लगता है क्योंकि विभाग,पँचायत औऱ अन्य संस्थानों में जाकर, खबर प्रकाशन का धौंस दिखाकर,या अन्य तिकड़मबाजी से पैसों की मांग की जाती है ऐसी शिकायत आये दिन विभाग के अधिकारियों और सरपंचों से सुनने को मिलते रहती है। और ये अधिकारी,जनप्रतिनिधि और कर्मचारी ऐसे लोगों से परेशान तो हैं लेकिन कौन टेंशन पाले ये सोचकर 100-200 देकर चलता करने में विश्वास रखते है। जिनसे ऐसे कथित पत्रकारों का मनोबल और बढ़ता जाता है।

कुछ लोग पत्रकारिता को समझ बैठे व्यवसाय-!

सुबह से मोटरसाइकिल निकाल कर 10 अधिकारी से मिलो 3 अधिकारी भी दे दिया 300 के हिसाब से तो हो गया 900 रुपये। 100 का पेट्रोल, 50 का नास्ता, फिर भी बच गया 750 रूपये..! अब जब बिना लगाये कोई 750 रुपये दिन में कमा ले रहा तो वो मेहनत भला क्यों करे।

अधिकारी, सरपँच ही बढ़ा रहे ऐसे पत्रकारों का मनोबल-

कोई आपको ठगे ये उसकी चालाकी तो है लेकिन आपकी कमजोरी भी है। आज 3000-5000 खर्च करके कोई भी किसी भी तथाकथित चैनल का रिपोर्टर बन जा रहा है,क्योंकि इससे सस्ता और अच्छा कमाई का साधन वर्तमान में नही है। लेकिन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को भी इतनी समझ तो रखनी होगी कि जो व्यक्ति उनके समक्ष आया है क्या वो किसी चैनल का सच मे संवाददाता है भी या नही, उस चैनल को राज्य स्तर में मान्यता है भी या नही, उक्त पत्रकार द्वारा समाचार लगाया जाता है या नही, वो किस क्षेत्र का पत्रकार है, उसकी विशेषता क्या है? इन सबसे न तो सरपंचों को मतलब रहता है न ही विभागीय अधिकारियों को। और फिर बाद में सिर पीटते नज़र आएंगे की पत्रकारों ने परेशान कर दिया है। ये तो मानो हिंदी फिल्म स्पेशल 26 की कहानी हो गयी।

जब सच्चे कलमकारों से होता है सामना तो उड़ जाते हैं होश-

100-200 देकर अपने भ्रस्टाचार को छुपाने वाले कुछ,अधिकारी लाखों-करोड़ों की काली कमाई पर पर्दा डालने की जुगाड़ में लगे रहते ऐसे लोगों के सामने जब कोई सच्चा पत्रकार पहुंचता है तो पत्रकारों के एक भीड़ को झेल कर आदी हो बैठे ऐसे सरपँच और अधिकारी इनको भी ऐसे ही 200-500 देकर चुप कराने की कोशिश करते हैं, या अपनी राजनैतिक धौंस दिखाने की कोशिश करते है। लेकिन जो सच का सिपाही है वो भला इनसे क्यों डरे? फिर होता है उनपर दबाव डालने की कोशिश या झूठे मुकदमो में फंसाने की साजिश..! लेकिन कुछ मनचले सिपाही ऐसे भी होते हैं जिनको इनकी गीदड़ भभकी से तनिक भी परवाह नही होती और ऐसे अधिकारी और राजनेता जनता के सामने एक्सपोज हो जाते हैं।
भले ही ऊपर तक मोटी रकम चढ़ावा चढ़ाने पर बच भी जाते हैं लेकिन पब्लिक उनको भूल नही पाती और अगले कार्यकाल में उन्हें सत्ता और कुर्सी से दूर करने में भी संकोच नही करती।

KRISHNA MAHILANE

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